अशोक अरोड़ा

1.साहित्य के बारे में आप क्या विचार रखते हैं?

उत्तर:- साहित्य समाज का दर्पण है, ये तो हम सभी जानते हैं। मेरे विचार से साहित्य, चाहे वो लेख हों, कहानियां हों, उपन्यास हों, कवितायें हों, धार्मिक ग्रंथ हों, का मतलब है आप मैं जानने समझने के प्रति रूचि जागृत करना, आपको आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति व शांति प्रदान करना, सौन्दर्य व प्रेम के भाव जगाना, जीवन की कठनाइयों पर विजय पाने के लिये प्रेरित करना है। मेरे विचार में साहित्य की भाषा किताबी व कलिष्ठ नहीं होनी चाहिये भाषा ऐसी हो जो आमजन भी आसानी से समझ सकें आपको शब्दकोष ले कर न बैठना पड़े।  

2. स्त्री परिवार और प्रोफेशन..

उत्तर:- भारतीय संस्कृति में नारी को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। लेकिन उसको घर की दहलीज तक सीमित भी रखा गया। आज नारी जीवन के हर क्षेत्र में कदम बढ़ा रही है। आज की नारी अपने कर्तव्यों को गृहकार्यों की इतिश्री ही नहीं समझती है, अपितु अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति भी सजग है। वह अब स्वयं के प्रति सचेत होते हुए अपने अधिकारों के प्रति आवाज उठाने की हिम्मत रखती है। शिक्षा के चलते नारी जागरूक हुई और इस जागरूकता ने नारी के कार्यक्षेत्र की सीमा को घर की चहरदीवारी से बाहर की दुनिया तक फैला दिया।

लेकिन आज भी  पुरूष समाज नारी का साथ  पूरी इमानदारी से देने के प्रति सजग नहीं है। अगर नारी प्रोफेशन के साथ साथ घर और अपने बच्चों तथा परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी को निभा सकती है तो पुरूष क्यूँ नहीं । जहाँ तक मेरा प्रश्न है मुझे प्रोफेशन के साथ साथ घर का काम करने में कोई शर्म नहीं।

3.स्त्री सर्जक और पुरूष सर्जक के सर्जन में क्या तफावत महसूस होता हैं ?

उत्तर:- नारी और पुरूष दोनों ही शानदार और सशक्त लिखते हैं। पर स्त्री सर्जित अधिकतर रचनाओं में केन्द्र बिन्दू नारी ही रही है या रहती है चाहे वो प्रेम, दर्द, विरह, या कोई समाजिक समस्या हो। परंतु पुरूष लगभग हर विषय पर सर्जन कर लेते हैं। आजकल एक चलन स्त्री सर्जनकर्ता की रचनायों में देखा जा रहा है कि जब भी कोई घटना घटती है तो वो पुरूष को जी भर कोसती है यहाँ तक कि अपशब्द कह दिये जाते हैं ऐसा करते समय शायद जोश में वो ये भूल जाती है कि पुरूष कहीं उसका पिता, भाई, प्रेमी व पति भी है। अच्छ बुरा दोनों जगह है। सर्जन करते समय अति से  बचना चाहिये क्यूँकि अति घृणा को जन्म देती है।

4. एक कवि या लेखक के लिये पढ़ना कितना जरूरी है?

उत्तर:- पढ़ना सबके लिये जरूरी है हाँ कौन कितना पढ़ता है, क्या पढ़ता है ये उसकी रूची पर निर्भर करता है। साहित्य को गर पाठक ही नहीं मिलेंगे तो फिर उसकी सार्थकता ही नहीं। हाँ एक लेखक व एक आम आदमी के एक ही रचना को पढ़ने का नज़रिया अलग अलग हो सकता है।

5. सोशल मीडिया के बारे में आपकी क्या राय है?

उत्तर:- सोशल मीडिया गर उसका सही व पूरी तरह इस्तेमाल किया जाये तो समाज को जागरूक बनाने, अपने अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति उनमें चेतना जगाने का सशक्त माध्यम है। और लोग इस दिशा में अग्रसर भी हैं। सोशल मीडिया बहुत सी छूपी प्रतिभाओं को सामने लाया है ला रहा है।

6. आपका साहित्यिक सफ़र ... किस व्यक्ति या चीज़ ने आपको लिखने के प्रेरित किया?

उत्तर:- मैं अधिकतर श्रृंगार रस में लिखता हूँ । मेरा मानना है कि घर समाज में अगर प्रेम मोहब्बत है तो समाज को आसानी सुधारा जा सकता है। और आज की भागदौड़ भरी दुनिया में इंसान सबसे पहले सुक़ूँ चाहता है और पढ़ने को कुछ ऐसा जो उसके दिल की छूले। भारीभरकम शब्दों से भरी रचना आम आदमी के सर से गुजर जाती हैं ये रचनायें किताबों या इनामों तक सिमट के रह जाती हैं । अब श्रृंगार है तो प्ररेणा भी नारी ही होगी। बहुत सी रचनायें प्रकाशित हो चुकी हैं । कुछ साझा काव्यसंग्रह जैसे गुलमोहर, गूंज, आकाश अपना अपना, काव्य सुंगन्ध-2, भाषा सहोदरी-1, कलाम को सलाम, भावों की हाला, शब्दों के रंग, सत्यम प्रभात आ चुके हैं तथा पुष्पगन्धा, सौ कदम व एक अन्य जल्द आने वाले हैं    

7. ऐसी किताब जो आप बार बार पढ़ना चाहें?

उत्तर:- यूँ तो बहुत कुछ पढ़ा, धार्मिक ग्रंथों से ले उपन्यास, कहानी लेख..कविताओं तक लेखक बहुत हैं किस किस के नाम लूँ । परंतू गीता एक ऐसी रचना है जिसको बचपन से पढ़ रहा हूँ और बार बार पढूँगा क्यूँकि हर बार एक नये प्रश्न को जन्म देती है गीता आपकी जिज्ञासा का अंत नहीं होने देती। 

Comment

You need to be a member of Facestorys.com to add comments!

Join Facestorys.com

Comment by Manjusha Mitra on August 18, 2016 at 8:38pm
बहुत नपे तुले मंझे हुये वक्तव्य...बधाई हो अशोक जी
Comment by Rashmi Abhaya on August 17, 2016 at 9:52am

बेहतरीन साक्षत्कार...सही कहा 'गीता' एक मात्र ऐसा ग्रंथ है जो जीवन के यथार्थ से आमना-सामना कराता है।

Blog Posts

Why You Should Hire the Movers in Advance?

Posted by Monali Swain on November 19, 2020 at 3:23pm 0 Comments

You should hire the right of the packers and mover in advance as this gives you many advantages. If you are thinking about the advantages, you get, then that will be more in numbers. You want the brief, then this article…

Continue

कुछ इस तरह!

Posted by Jasmine Singh on November 13, 2020 at 9:32am 0 Comments

कुछ इस तरह लिपटी हैं
तेरी पलकें मेरे दिल के तारों से
मज़ार के धागों से
कोई मन्नत लिपटी हो जैसे
©Reserved by Jasmine Singh

શું? આ છે જિંદગી !

Posted by Sonu on October 15, 2020 at 7:36pm 0 Comments

મૃગ તરસે જળ દોડી દોડી હાથધર્યું ઝાંઝવાનીર, માનવ ભૂખ્યો પ્રેમનો મથામણ કરી પામ્યો વહેમ 

શું? આ છે જિંદગી !

રોણુ જન્મ ને મરણ સમયે સમાન મનોવ્યથા, આંતરીક ગુપશુપ ચાલી રહી ભીતર

શુ ? આ છે જિંદગી !

રાજકુમારો ને મહેલોના સપનામાં  રાચતા, આંખો ખુલી અરે ! આતો મૃગજળસમું સ્વપ્નલોક

શુ? આ છે જિંદગી !

મુખપર હસી ઠીઠોલી, મનમાં કરોડો તરંગ ઉછળે! વિચારે તો જાણે ઘેરો ઘાલ્યો

શુ? આ છે જિંદગી !

ભોરથતા આશબંધણીકાલે નહીતો આજે, હશે પિયુ સંગ સ્નેહમિલન પણ આતો…

Continue

तुझको लिखती रहूंगी मैं !

Posted by Jasmine Singh on October 15, 2020 at 1:22am 0 Comments

तुझे लिखती रहूंगी मैं

तेरे प्यार की स्याही में

अपनी कलम को डुबो कर

इस ज़िंदगी के पन्नों पे

तेरे साथ जिये लम्हों को

कविताओं में बुनकर

तुझको लिखती रहूंगी मैं

तुझको जीती रहूंगी मैं

तू वो है जो मेरे साथ है

और मेरे बाद भी रहेगा

कभी किसी के होठों में हंसेगा

किसी की आंखों से बहेगा

किसी अलमारी के पुराने

दराज की खुशबु में महकेगा

किसी की आंखों की गहराई

जब जब मेरे शब्दों में उतरेगी

तब तब मेरे बाद तुझे पढ़ने वालों के…

Continue

इल्ज़ाम ए इश्क़

Posted by Monica Sharma on October 14, 2020 at 9:12pm 0 Comments

धीरे-धीरे सब दूर होते गए

वक़्त के आगे मजबूर होते गए

रिश्तों में हमने ऐसी चोट खाई की

बस हम बेवफ़ा और सब बेकसूर होते गए

इल्ज़ामों की श्रृंखला बड़ी लंबी थी साहेब

वो लगाते गए हम मुस्कुराते गए

अपनी झुकी हुई भीगी पलकों के नीचे

जख्म ए इश्क़ हम छुपाते चले गए

बरसों किया इंतजार हमने

तेरी मीठी सी मुस्कान का

पर बेरहम तुम नजरों से

कत्ल करने को खंजर चलाते गए

जिक्र ए इश्क़ जो कभी सुनाई दे

जुबां पे तेरा नाम और

नज़रों में तेरा अक्स दिखाई…

Continue

आसमान से ऊंचा

Posted by Sakshi garg on October 14, 2020 at 10:16am 1 Comment

अक्सर सिर की छत बन कर धूप और बारिश से बचा लेता है पिता...

यूं ही नहीं उसे आसमान से भी ऊंचा कहते ।

दो बातें

Posted by Sakshi garg on October 14, 2020 at 10:13am 0 Comments

कुछ बातें इन दो कारणों से भी तकलीफ दे देती हैं : 

1• काश ! ये सब सच होता ।;

2• काश ! ये सब झूठ होता ।

पिता

Posted by Sakshi garg on October 10, 2020 at 9:02pm 0 Comments

मुझे रखा छांव में, खुद जलते रहे धूप में...

हां मैंने देखा है फरिश्ता अपने पिता के रूप में ।।

© 2020   Created by Facestorys.com Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Privacy Policy  |  Terms of Service